गुरुवार, 21 अगस्त 2014

सियासत का सच

सियासत सच से वाबस्ता ज़ुल्म पर क़हर बन जाए,
सियासत गर जो हो गंदी  दिलों का ज़हर बन जाए !

सियासत हो जो दंगो की वहां एक रात बन जाए,
सियासत हो जो नंगो की वहां ग़ुजरात बन जाए !

सियासत खेल है शतरंज का बिछ्ती बिसातें हैं,
के नेता जब सियासत खैलते लुटती बारातें हैं !

सियासत मैं नहीं माँ बाप और ना ही बहन भाई,
सियासत ने बहुत से देशों की है नाक कटवाई !

सियासत मैं किया जो ज़ुल्म तो इनआम मिलता है,
चुनावी रण मैं फिर प्रधान का भी नाम मिलता है !

कोई नंगाई को जब ओड लेता है सियासत में,
तो फिर नोटों से सब कुछ मोड लेता है सियासत में !

सियासत चीज़ है एसी के  छोडे से नहीं छुट्ती,
गरीबों की रहे इज़्ज़त सरे बाज़ार यूँ लुट्ती !

गरीबों को खत्म करते हैं ये ना के गरीबी को,
सियासी लोग धोका देते हैं अपने क़रीबी को !

सियासी लोग कहते हैं के जब हम वोट पाते हैं,
भला इस देश का होता है जब हम नोट खाते हैं !

के करते खर्च हम पैसा तो आता है बज़ारों में,
ना ज़िंदों की क़दर इनको लगाते हैं मज़ारो में !

सियासी लोग तो लड लेते हैं कुश्ती के दंगल भी,
के जब करते हैं घोटाले तो फिर होती है मंगल भी !

करोगे चपलूसी तुम या फिर तुम झूट बोलोगे,
समझ लो तुम सियासत  में कई दरवाज़े खोलोगे !

सियासत ले के डूबेगी यक़ीं है ये "शिहाब" एक दिन,
जो करते हैं गुनाह देना पडेगा फिर हिसाब एक दिन !

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